Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

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Mir Taqi Mir Shayari in Hindi


Mir Taqi Mir Shayari in Hindi


Mir Taqi Mir Shayari in Hindi

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया

अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया

जब कि पहलू से यार उठता है,
दर्द बे-इख़्तियार उठता है।

रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना

हमारे आगे तिरा जब किसी ने नाम लिया,
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया।

Ishq Ik ‘Mir’ Bhari Pathar Hai
Kab Ye Tuj Naatwan Se Uthta Hai

Mir Un Neem Baz Aankhon Main
Sari Masti Shrab Ki Si Hai
Daikh Tu Dil Ke Jaan Se Uthta Hai
Ye Dhuan Kahan Se Uthta Hai

इक़रार में कहाँ है इंकार की सी सूरत
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर

अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
यानी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया

दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या

Bewafai Pey Teri Jee Hai Fida
Qahar Hota Jo Bawafa Hota

दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

ध के गोया पत्ती गुल की वो तरकीब बनाई है
रंग बदन का तब देखो जब चोली भीगे पसीने में

हम जानते तो इश्क़ न करते किसू के साथ
ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरज़ू के साथ

Ab Kar Ke Faramosh Tu Nashad Karo Gey
Par Ham Jo Na Hon Gey Tu Bohat Yaad Karo Gey

‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

सख़्त काफ़िर था जिन ने पहले ‘मीर’
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया

कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन
शौक़ ने हम को बे-हवास किया

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

गुफ़्तुगू रेख़्ते में हम से न कर
ये हमारी ज़बान है प्यारे

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

pattā pattā buuTā buuTā haal hamārā jaane hai
sjaane na jaane gul hī na jaane baaġh to saarā jaane hai

कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
धूम है फिर बहार आने की

अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है

Ab Tu Jate Hain But Kade Se Mir
Phir Milen Gey Agar Khuda Laya

ishq ik ‘mīr’ bhārī patthar hai
kab ye tujh nā-tavāñ se uThtā hai

वस्ल में रंग उड़ गया मेरा
क्या जुदाई को मुँह दिखाऊँगा

जम गया ख़ूँ कफ़-ए-क़ातिल पे तिरा ‘मीर’ ज़ि-बस
उन ने रो रो दिया कल हाथ को धोते धोते

अश्क आँख में कब नहीं आता,
लहू आता है जब नहीं आता।

फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

Ab Dekh Le Ke Sena Bhi Taza Hoya Hai Chak
Phir Ham Se Apna Hal Dikhaya Na Jaye Ga

सिरहाने ‘मीर’ के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है

अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मत मिला कर मीर,
कि हम ग़रीब हुए हैं इन्हीं की दौलत से।

याद उस की इतनी ख़ूब नहीं ‘मीर’ बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा

Yun Nakam Rahen Gey Kab Tak Ji Mein Hai Ik Kaam Karen
Ruswa Ho Kar Mar Jawain Us Ko Bhi Badnam Kren

Milne Ka Wa’ada Un Ke Tu Munh Se Nikal Gya
Pochi Jga Ju Mai Ne Tu Kha Hans Ke Khwab Main

किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया

लगा न दिल को क्या सुना नहीं तूने,
जो कुछ मीर का आशिकी ने हाल किया।

‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

Be-Khudi Le Gayi Kahan Ham Ko
Dair Se Intezaar Hai Apna

देगी न चैन लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म उस शिकार को
जो खा के तेरे हाथ की तलवार, जाएगा

क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़

मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में,
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया।

मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

सुबह होती रही शाम होती रही
उम्र यूँ ही तमाम होती रही।

Gham Raha Jab Tak Keh Dam Mein Dam Raha
Dil Ke Jane Ka Nahayat Gham Raha

उनने तो मुझको झूंटे भी न पूछा एक बार
मैंने उसे हज़ार जताया, तो क्या हुआ

मेरे रोने की हक़ीक़त जिसमें थी
एक मुद्दत तक वह काग़ज नम रहा

मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों,
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं।

‘मीर’ हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे
इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो

बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना

गलियों में अब तलक तो, मज़्कूर है हमारा
अफ़सान-ए-मुहब्बत, मशहूर है हमारा

पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है
दुनिया तिरी आँखों को भी क्या क्या न कहे है

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

‘मीर’ अमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे

क्या जानूँ चश्म-ए-तर से उधर दिल को क्या हुआ,
किस को ख़बर है मीर समुंदर के पार की।

शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का

बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है।

इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

‘मीर’ साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ

चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच

Phirte Hai Mir Khwar Koi Pochta Hi Nahi
Is Aashqi Main Tu Izat Saadat Bi Gayi

अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे
पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे

Iqrar Mein Kahan Hai Inkar Ki Se Sorat
Hota Hai Shoq Ghalib Us Kin Ahi Nahi Par

होगा किसी दीवार के साए में पड़ा ‘मीर’
क्या काम मोहब्बत से उस आराम-तलब को

Rah Dor Ishq Mein Rota Hai Kya
Aage Aage Dekhiye Hota Hai Kya

Nazki Us Ke Lab Ke Kia Kehye
Pankhari Ik Gulab Ki Si Hai




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